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Sunday, September 25, 2011

बेटी

वह कोमल होकर भी
ढो लेती है सारी ज़िन्दगी
हंसकर तुम्हारी
हर मर्यादा का भार

और तुम
केवल नौ महीने
भी उसको कोख नहीं दे पाते

ज्यों-ज्यों बड़ी वह होती
सिर्फ बोझ होने का
उसे एहसास दिलाते

सोचना कभी
क्या होता जो
तुम्हारी माँ को भी
बेटी होने के लिए
मार दिया जाता

ना तुम होते और ना
होता तुम्हारी
सोच का गहरा अँधेरा
जिसमे तुम्हे
तुम्हारी अजन्मी बेटी की
चीखें नहीं सुनाई देती !

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