Mastodon
Showing posts with label short story. Show all posts
Showing posts with label short story. Show all posts

Friday, November 7, 2014

FREEDOM

The year was 1975.They had met in Shantiniketan. He was already a reputed writer who was visiting for a workshop and she was one of the most stunning and promising singers the university had seen in the recent years.

It seemed like love at first sight, though he was several years her senior. Like a proper aristocrat, the following week her parents had received a formal proposal for marriage which they had no reason to deny.

He expected no dowry and the only condition was that Suparna would not sing after the marriage, certainly according to her parents this was not a huge price to pay by a poor girl to marry into a rich aristocratic family. She was hesitant at first but then love took over her reservations and she believed her love would soon make him change his heart about her singing.

She went into the haveli as Chotti bahu (young daughter-in-law). He had no siblings and after his father’s death, his mother had retired as a pious widow to Vrindavan to spend her final years praying. It was a new life, she had truckloads of new sarees and jewellery, the house was palatial and she had dedicated maid servants for her.  She had started reading English classics at the university and continued that habit, taking out books from the huge library at the haveli, her favourite being the ones by the Bronte sisters.

He called her his muse and dedicated his new collection of poems to her. She was mighty pleased. But gradually Suparna was overpowered by her new identity as Mrs.Sengupta. She was no longer the happy go lucky girl she once was.

Other than his short temper, he was a pleasant man and never interfered in her routine in the house. She had once casually mentioned starting Rabindra Sangeet training again, he had smashed the wine glass against the wall and didn’t talk to her for a week. She never brought up the topic again.

Three years later she was used to a walking-on-the-eggshells life. Whenever his mother wrote or made a phone call to her it was about conceiving an heir for the haveli. Suparna felt violated in more ways than one. Obviously the poor lady didn’t know her son and his wife still lived in different rooms. He being the artist always needed his space and she was not allowed to get into his room, however whenever he chose he could come to her room for exercising his conjugal rights.

On their third anniversary he bought her a singing parrot in a gold cage. Though initially she was averse to the idea of keeping a bird caged but according to him the bird could be the closest she could get to singing now, so she accepted him like a consolation prize and not as a gift of love.

Suparna named him Mitthu, the chirpy and bubbly bird soon became the companion she never had in her life. She would take him around the house neatly perched on his gold bar in the elegantly crafted gold cage. The lady and her bird had become each other’s shadow.

Just a few weeks later one morning, Mitthu was found dead inside the cage. Suparna was inconsolable, but a few days of gazing into the empty cage resting on her dresser, led her to an epiphany. Mitthu’s unexplained death was a message for her. She would one day end up like him if she didn’t help herself now, she thought.

The next weekend she quietly walked out of the house with only the cage in her bag. It was precious enough to pay for the rest of her education at the university and the lawyer’s fees to file a divorce petition.

Suparna had started singing again, and every time she did she felt Mitthu joining her in his honey laden voice. It was ironic that her freedom from her golden cage was bought by selling another cage. Finally Suparna and Mitthu were both free.

Monday, September 16, 2013

कस्तूरी

This story first appeared in the Anniversary issue of THE BROWSING CORNER.
 
लालू ने माँ से फ़ोन पर बात करने की कोशिश की थी ,पर "ओ लालुआ " से अधिक माँ कुछ न बोल पाई और बस उसकी सिसकियाँ लालू के कानों में अब तक गूंज रही थी I लालू आँख बंद कर दूर पहाड़ों में अपने गाँव में,अपने घर पहुँच गया था I पानी की कूहल पर से कूद कर अपने सेब के पेड़ों को छूता हुआ, कच्चे टमाटरों की क्यारिओं के बीच से कूदता हुआ, ओबरे में गौरी,नीली और धनु को आवाज़ लगाता सीधा चूल्हे के पास,माँ आज शायद घी-बाली बना रही थी I ज़रूर पवना के रिश्ते को लड़के वाले आ रहे होंगे I पवना लकड़ी के लम्बे बरामदे के एक छोर पर बैठ कर अपने बाल संवार रही है ,लालू उसकी कंघी छीन  कर भागता है तो पढाई छोड़ लीला और सीता भी पवना के साथ उसके पीछे भागने लगती हैं I लालू बहुत तेज़ भाग रहा है और फिर अचानक वो सारी श्वेत-श्याम तस्वीरें लाल हो जाती हैं, जैसे किसी ने उसकी यादों पर लाल स्याही गिरा दी हो I लालू अपने  सिर  को अपने घुटनों में दबाकर बैठ जाता है और उसकी गालों पर बेरंग नमकीन यादें बहती जाती हैं I

लालू सिर्फ पांच साल का था जब पहली बार अम्मा के साथ धार पार की जातर में गया था I उसकी उम्र के बाकी लड़के तो शहर से आये नए-नए खिलोनों और झूलों में ही फंसे थे पर लालू बेचैनी से मंदिर में होने वाली बकरे की बलि की बाट जो रहा था I लालू को उसकी बड़ी बहन पवना  ने बताया था कि  बलि के बाद मस्तक देवी को चढ़ाया जाता और धड़ का मांस प्रसाद मानकर बाँट दिया जाता  I चूँकि वो ब्राह्मण थे उन्हें मांस खाना निषेध था ,पर फिर भी बलि देखने की लालू की इच्छा प्रबल थी I एक ही झटके में तलवार ने उस बकरे के मस्तक को देवी की चौखट पर गिर दिया था,सारा आंगन खून से रंग गया था, और उसका निर्जीव धड़ वहीँ लुड़का पड़ा था,लालू के अलावा सारे औरतों और बच्चों ने आंखें मूँद कर हाथ जोड़ रखे थे I

पिछले साल उसने अपने दोस्त हल्कू के साथ गाँव के तालाब से पकड़कर एक बतख का बच्चा मारा था I जैसे टीवी में अमिता बचन गुंडों की गर्दने मरोड़ता था वैसे  ही गर्दन को एक  झटके से घुमाना होता है  I बहुत  मजा आया था पर कोई खून नहीं निकला, बस थोड़ी देर उसने कीं-कीं करी और फिर मर गया I

बुड्ढी दिवाली में गाँव के बड़े लड़के एक जंगली मुर्गे का शिकार करके लाये थे ,उससे तो खूब खून निकल रहा था I लालू को खून देखके बड़ा मजा आता, जैसे उसके अंदर का कोई अदृशय राक्षस तृप्ति पा जाता I

उसने बड़ी मिन्नत कर के संजू भाईजी से एक टुकड़ा  भुना हुआ मांस माँगा था और चोरी-चोरी ओबरे में खा ही रहा था जब अम्मा पता नहीं कहाँ से आ गयीI बापू तो चौपाल में था ,नहीं तो बहुत मार पड़ती I

अम्मा ने बस  थोड़ा  सा डांटा और फिर प्यार से समझाते हुए बोली ,"  देख लालुआ , हम तो देवता जी के पुरोहित है ना ,कल मेरे साथ मंदिर में जा कर देवता जी से क्षमा मांग लेना,  तू  तो बालक है न इसलिए वो नाराज़ ने होंगे I देख अगर तेरे बापू को पता चला तो फिर ..."
लेकिन  लालू के अन्दर के पीशाच के मुंह तो उस दिन खून लग गया था , उसके बाद बहुत बार उसने छुप -छुपाकर मांस खाया था ,कभी घर में कभी बाहर I

ज्यूं -ज्यूं  लालू बड़ा होता गया ,पिशाच की खून की भूख भी बढ़ती गयी I पर गाँव में केवल दूसरी जात वाले शिकार को जाते और मांस काटते और खाते I लालू के पुरखे तो ग्राम देवता का पुजारी थे और उनके घर में यह सब निषेध था I लालू धीरे-धीरे बहाने बनाकर उन लड़कों के साथ जाने लगा I पहले-पहल उन्होंने उसे उसके दादा पुरोहित जी के डर से बहुत रोका ,पर जब वो कैसे भी न माना ,तो उन्होंने उसे अपनी मण्डली में शामिल कर लिया I हर पूनम की रात को जब लड़कों की टोली शिकार को निकलती ,लालू सबसे आगे चलता, सबसे ज्यादा जल्दबाज़ी उसे ही रहती,खून देखने की I

लालू  करीब 13 या 1 4 का रहा होगा जब ऐसी ही एक शिकार की रात अचानक से झाड़ियों को चीरता हुआ एक जंगली सांड टोली के सामने आ गया था, बड़ी बहादुरी से बिना पलक झपकाए लालू ने एक ही झटके में उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी थी I उस दिन से लालू मण्डली का हीरो बन गया था I

सालों से चली आ रही उसकी यह चोरी एक रात पकड़ी गयी ,लालू हर शिकार के बाद एक हड्डी ओबरे में दबा देता ताकि एक दिन वो अपने सारे शिकार गिन सके  I जैसे उनके पुरखों ने लड़ाइयों से जीते हुए सिक्के चौखटों पर ठोके हुए थे, जो उनकी बहादुरी के साक्ष्य थे I आज तो बड़ा खास दिन था ,आज टोली ने एक कस्तूरी हिरन मारा था,बड़े-बूढ़े कहते थे की जब कस्तूरी का मीट पकता तो कई मीलों तक उसकी सुगंध जाती,वही खुशबू जो कस्तूरी की नाभि में होती है और जिसकी खोज में वो भटकता रहता है I

इस बार लालू सब से छुप कर मीट का टुकड़ा तो घर न ला सकता था ,पर कस्तूरी के सुंदर सींग उसके हिस्से आये थे I जैसे ही एक छोटा सा गड्ढा बना कर लालू सींग दबाने वाला था पता नहीं कैसे बापू ओबरे में आ गए I गाँव के कुछ लोगों ने उनको लालू की हरकतों की ख़बर दे दी थी और वो लालू को सबूत के साथ पकड़ना चाहते थे I उस दिन लालू की खूब पिटाई हुई,वैसी ही जैसी कभी-कभी अम्मा की होती थी ,हाथों से ,लातों से ,छड़ी से ,घूसों से I लालू की बहनें और अम्मा चुपचाप देखती रही,वो कर भी क्या सकती थी I

लालू ने सोच लिया था ,वो अब यहाँ नहीं रहेगा,बम्बई जायेगा और हीरो बनके अमिता बचन की तरह गुंडों की खूब धुनाई करेगा I यही होगा उसकी दिलेरी का सबूत ,फिर देखना कैसे बापू ढोल-नगाड़े लेकर आयेगा उसको मनाने I

अगली सुबह लालू गाँव से कुल्लू की पहली बस में चढ़ गया,फिर एक बस के बाद एक और बस,फिर ट्रेन  और एक ट्रेन बदल कर चौथे-पांचवे दिन लालू बनारस स्टेशन पर उतरा था I

लालू दो दिन से भूखा था, घर से लाए हुए पैसे खर्च हो गए थे I भटकता-भटकता लालू घाटों पर पहुँच गया था और भूख से बेहाल भिखारियों की कतार  में बैठ गया था I एक स्वामीजी खाना बाँट रहे थे ,लालू की तरफ आलू-पूरी बढाता उनका हाथ अचानक रुक गया था I लालू ने अपनी हलकी भूरी आँखों से ऊपर देखा , लम्बी धौली दाड़ी ,लम्बे बाल ,उन्होंने पूछा ," कहाँ से आये हो बेटा ?"

कुछ समय बाद लालू को उनके सेवक बाबाजी के आश्रम में ले गए थे I उसे नए कपडे दिए गए ,उसके सिर के  सारे बाल निकाल दिए गए थे I शाम की आरती के बाद उसे बाबाजी के कमरे में भेज दिया गया ,उस रात लालू दयानंद बन गया I अब वो हर समय बाबाजी के साथ ही रहता ,उनके सब छोटे-मोटे काम करता और देर रात जब बाबजी थक कर सो जाते और  उसे खुद से घिन्न  आने लगती तो घंटों घाट पर बैठा रहता I ऐसी ही एक रात उसने पहले बार अघोरियों को देखा उस पार के घाट पर जलती चिताओं के इर्द-गिर्द कुछ करते हुए I अगली अमावस को लालू उनके पास जा पहुंचा ,उनका विभत्स रूप जो दुनिया को डराता था,वही लालू को आकर्षित कर रहा था  I
अब वो हर रात मरघट में उनके शिविर पर जाता ,पहले उन्होंने उसे डराया, भगाने  की खूब कोशिश की ,पर जब वो हर रात जाता रहा तो उन्होंने उसे अपना सा लिया I वो उनकी चिलमे भरता ,कभी भांग का एक-आध कश उसे भी मिल जाता ,चाय बनाता और घंटों उनकी कहानियाँ सुनता I लालू एक बार फिर दो जिंदगियां जीने लगा I
लालू को अब बनारस में 2 साल से अधिक समय हो गया था, उसने कभी घर के बारे में नहीं सोचा था I फिर एक दिन सम्मलेन से बाबाजी एक और छोटे लड़के को ले आये थे I वो उत्तराखंड के किसी गाँव से भाग कर आया था ,उस रात लालू की जगह बाबाजी के कक्ष में वो गया था I अब बाबाजी के नया चहेता वो था -पदमनाभ I
एक दिन पौ फूटे जब लालू अघोरियों के यहाँ से लौट रहा था तो उसने देखा पदमनाभ,कुँए के पास बैठा रो रहा था I लालू को आता देख वो भाग कर आया और लालू से लिपट गया ," दया भाई मुझे यहाँ अच्छा  नहीं लगता ,मुझे गाँव जाना है,माँ के पास "I वो सुबकता जा रहा था और लालू का सारा क्रोध,इर्ष्या  पिघल रही थी I एक पल को उसे लगा जैसे उसकी बहन लीला उससे  लिपटकर रो रही  हो I
उस दिन शाम को बाबाजी ने उसे फिर अपने कक्ष में बुलाया ,और बिना कुछ बोले कुछ तस्वीरें उस पर फ़ेंक दी ,उसकी तस्वीरें अघोरियों के साथ I बाबाजी बोले," दयानंद ये क्या है ,क्या कमी है तुम्हे यहाँ जो तुम ऐसे…. खैर इससे पहले की तुम्हारे साथ से दूसरे लड़के भी बिगड़ जायें तुम कल ही चले जाओ ,असीमानंद तुम्हे पैसे दे देगा I "

लालू कुछ नहीं बोला ,पैसे उसने ले लिए थे I रात को करीब बारह बजे उसने बाबाजी का दरवाज़ा खटखटाया ,वो झल्लाकर बोले ," कौन है ?" लालू कुछ नहीं बोला  उसने फिर दरवाज़ा खटखटाया ,जैसे ही दरवाज़ा खुला लालू छुरा घोंपता गया और पदम् को ले कर पीछे की दीवार से कूद गया I चार दिन बाद लालू दिल्ली से पदम् को उसके गाँव की बस में बैठा चुका था  और खुद  एक बार फिर  भटक रहा था I
अब वो  अमिताभ बच्चन जैसे हीरो  नहीं बनना चाहता था, अब वो बुरा बनना चाहता था इतना बुरा के अच्छाई की ओट में बुरा करने वालों को सज़ा दे सके I
 
अब लगभग चार  साल बाद दिल्ली का दलदल लालू को रस आने लगा था I अब वो दयाभाई था ,बड़े-बड़े होटलों  और फार्महाउस पर "माल" पहुँचाने वाला दया भाई I पैसा आने लगा था,पर एक खालीपन  था जो शराब से भरता था , अय्याशी  से I जिस्मों की  दलाली के पैसे से भी उसे वैसी ही दुर्गन्ध आती जैसी मरघट में अघोरिओं के चिताओं को कुरेदने से आती , मौत की दुर्गन्ध ,जिसमे लालू सब कुछ भूल पाता ,थोड़े समय के लिए ही सही पर सब कुछ भूल पाता I
 
फिर एक दिन दया लालू बनकर माँ के पास लौटा I माँ छत पर छलियाँ सुखा  रही थी I लालू पहले से अलग दिखता  था पर माँ उसकी आंखें पहचान गयी थी I बापू ने उसे देखते ही मुंह मोड़ लिया और अपने कमरे में चला गया I  माँ ने बताया की इन छह  सालों  में उसकी तीनों बहनों के ब्याह हो गए थे और बापू ने उसको मरा  मानकर पिछली साल उसका श्राद्ध कर दिया था,और सारी ज़मीन-जायदाद तीनों लड़कियों के नाम कर दी थी I माँ का दुःख लालू समझता था पर वो जानता था अब उसके लिए वहां कोई जगह नहीं थी I अगली सुबह ही वो माँ के लिए अपना फ़ोन नंबर लिख कर चुपचाप अपने लौट दलदल में लौट आया था I
अब दया का काम में मन नहीं लगता था ,वो पहले से भी ज्यादा पीने लगा था I  एक दिन जब  कूड़ा लेने वाली लड़की उसकी बोतलें उठा रही थी , उसने देखा उसने चहरे पर कपड़ा बाँध रखा था ,लालू ने उससे पूछा ," ! क्या तुझको मुझसे घिन्न आती है ?"

अचानक पूछे सवाल से वो घबरा गयी और में सिर हिलाया I लालू ज़ोर -ज़ोर से हँसने लगा ,वो डर गयी और जल्दी से अपनी बोरी उठा बाहर की तरफ जाने के लिए मुड़ी  I लालू ने उसका हाथ पकड़ लिया I
वो चिल्लाई ,"साहब क्या कर रहे हो?जाने दो!"
"अभी तो तूने कहा तुझे मुझसे घिन्न नहीं आती",लालू बोला I

उसके बाद क्या हुआ लालू को याद नहीं ,जब पुलिस उसे लेने आई तो वो लड़की वहां खून में लथ पथ  मरी पड़ी थी और चारों तरफ शराब की बोतलों के कांच बिखरे पड़े थे I

कल लालू को बलात्कार और खून के जुर्म में फाँसी होने वाली थी I एक और कस्तूरी अपनी भयावह "मृगतृष्णा " से आज़ाद होने वाला था  I

Keywords

2019 April Blogging challenge B-A-R BOY Blogarhythm Book Review Buddha December GADGETS HAIKU Hamlet Rumi Ruskin Bond Sexism Stream of consciousness Womensweb answers anxiety apathy barathon birthday blog blogathon books breasts brothers bullying cartoons chandigarh child childhood children cities colour compassion contest cosmos culture dad daughter de death death loneliness alone delhi depression desire devi discrimination disorder diwali domestic violence dreams emily emotional abuse eyes facebook fairytale family fear feminism festival film fire first flash fiction fog freedom freeze frenemy friends games gender gender ratio girls god grandfather grandmother grief happy heart hills hindi home hope husband independence day indiblogger internet jagjit singh kashmir kerouac kids lessons life life lessons light loneliness lonely longing loss love lover marriage me memories memories men menstruation mental health mind miss mom mom dad mother mother's day motherhood mythology nest new year nobody nostalgia pain pakistan panjab university papa paradoxes patriarchy periods poem poet poetry priyamvada questions random thoughts rape relationships religion remember rickshaw ritual sad sex sexual harassment sexual harrasment shimla short story silence social media soul sufi suicide summers taboo time toddlers tradition tragedy twitter valentine violence voice war winter woman women women's day words. thoughts words.thoughts worry worship writer writing yatra yeats zen zen. बेटी माँ

COMPANIONS CALLED BOOKS

To Kill a Mockingbird
The Catcher in the Rye
Animal Farm
The Alchemist
One Hundred Years of Solitude
Romeo and Juliet
Frankenstein
The Odyssey
The Adventures of Huckleberry Finn
The Count of Monte Cristo
Eat, Pray, Love
Lolita
The Da Vinci Code
The Kite Runner
The Silence of the Lambs
The Diary of a Young Girl
Pride and Prejudice
Jane Eyre
The Notebook
Gone With the Wind
}

The Human Bean Cafe, Ontario

The Human Bean Cafe, Ontario
my work on display there !!!!!